क्या आप जानते हैं की आज के समय में लोग इतना दुख क्यों उठा रहे हैं हर तरफ दुख ही दुख बीमारी ही बीमारी कहीँ भ्रष्टाचार तो कहीँ आपदा और भी क्ई तरह की समस्याएं आज कोई सुखी नहीं सब ओर दुख ही दुख।
नानक दुखीआ सब संसार
दोस्तो ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारी भक्ति साधना पूजा पाठ सही नहीं है हम नकली गुरुओं पंडो और संतो के चक्कर मे पड़कर अपने अनमोल जीवन को खराब कर रहे हैं जो हमसे ऊट पटांग की पूजा पाठ साधना करवाकर अपनी जेबें भर रहे हैं उसके बाद हम सुखी रहे या दुखी इन्हें कोई मतलब नहीं भक्तों को तो सब कुछ त्यागने की सलाह देते हैं लेकिन खुद धन इकट्ठा करके अपने विजनस बढ़ा रहे हैं किसी ने स्कूल कौलेज किसी ने बड़े बड़े होटल और शापिंग मौल बना रखे हैं ।
~~~~~सत्संग~~~~~
गुरुदेव जी कहते हैं की जिस लोक में हम रह रहे हैं इस लोक का स्वामी (निरंजन काल ) है और यहाँ वही सुखी रहेगा जो पवित्र गीता जी में वर्णित विधिवत पूजा पाठ करेगा अन्य नहीं' तो क्या है वो पूजा पाठ आइये जानते हैं ।
आज तक हमसे श्री ब्रह्मा जी श्री विष्णु जी श्री शिव जी व अन्य भगवानों की व अवतारों श्री कृष्ण जी श्री रामचन्द्र जी व हनुमान जी की पूजा पाठ करवाते रहे ये पंडे जबकि इस प्रकार की भक्ति का कोई प्रमाण नहीं है न पवित्र गीता जी में है और न वेदों में ।
जो इक्कीस ब्रम्हांड का स्वामी व हम सबका भी स्वामी है पवित्र गीता जी में कहता है ।
गीता अध्याय 8 श्लोक नं 13
ओम् इति एकाक्षरम् ब्रम्हा व्याहरन्मामनुस्मरन् य: प्रयाति त्यजन् देहम् स: याति परमाम् गतिम् ।।13।।
अनुवाद ~~~ गीता बोलने वाला काल कह रहा है की (माम् ब्रम्हा) मुझ ब्रम्ह का तो (इति) यह (ओम् एकाक्षरम्) ॐ एक अक्षर है (व्याहरन) उच्चारण करके(अनुस्मरण) स्मरण करने का(य:) जो साधक (त्यजनदेहम्) शरीर त्यागने तक अर्थात् अंतिम स्वांस तक (प्रयाति) स्मरण साधना करता है (स:) वह साधक ही मेरे वाली(परमाम् गतिम्) परमगति को (याति) प्राप्त होता है ।
बताइये केवल एक ॐ अक्षर है इस प्रभु का और पाखंडियों ने क्या क्या नहीं करवा दिया हमसे कभी पेड़ों की पूजा कभी पत्थरों की पूजा हद तो तब हो गई जब भगवान ही गोबर का बना डाला ये तो अच्छा हुआ की इन पंडो ने भोग मिठाई का लगाया क्योंकि ये प्रसाद इनको भी तो खाना था अब देखिये (ज्योति निरंजन)काल इस इक्कीस ब्रम्हण्ड का स्वामी पवित्र गीता अध्याय नं 7 श्लोक नं 15
न माम् दुष्कृतिन: मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः मायया अपृह्तज्ञाना: आसुरम् भावम् आश्रिताः ।।
अनुवाद~~~~माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुर स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूर्ख मुझको नहीं भजते अर्थात् वे तीनों गुणों (रजगुण ब्रम्हा जी सतगुण विष्णु जी तमगुण शिव जी ) की साधनाही करते रहते हैं अर्थात् ब्रम्हा विष्णु शिव जी अथवा किसी अवतार की पूजा का वर्णन नहीं है ।
और इन पाखंडियों ने पता नहीं क्या क्या पुजवा दिया अब देखीये इन पाखंडियों के बारे में क्या लिखा है ।
सामवेद संख्या नं 1400 उतार्चिक अध्याय नं 12 खंड नं 3 श्लोक नं 5
भद्रा वस्त्रा समन्या३ वसानो महान कविर्निवचनानी शंसन ।
आ वच्यस्व चम्वो: पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ ।।5।।
अनुवाद~~~~~चतुर व्यक्तियों ने अपने वचनों द्वारा पूर्ण परमात्मा(पूर्ण ब्रम्हा) की पूजा का सत्यमार्ग न करके अमृत के स्थान पर आन उपासना(जैसे भुत पूजा पितर पूजा श्राद्ध निकालना तीनों गुणों की पूजा ( रजगुण ब्रम्हा सतगुण विष्णु तमगुण शंकर) तथा ब्रम्हा काल की पूजा मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारों चर्चों व तीर्थ उपवास तक की उपासना ) रूपी फोड़े व घाव से निकले मवाद को आदर के साथ आचमन करा रहे होते हैं उसको परमसुखदायक पूर्ण ब्रम्हा कबीर सहशरीर साधारण वेशभूषा में सत्यलोक वाले शरीर के समान दूसरा तेजपुंज का शरीर धारण करके आम व्यक्ति की तरह जीवन जी कर कुछ दिन संसार में रह कर अपनी शब्द साखियों के माध्यम से सत्यज्ञान को वर्णन करके पूर्ण परमात्मा के छुपे हुए वास्तविक सत्य ज्ञान तथा भक्ति को जाग्रत करते हैं ।
और फिर कहते हैं
गीता अध्याय नं 16 का श्लोक नं 23
य:शास्त्रविधिम् उत्सृज्य वर्तते कामकारतः न स:
सिद्धिम् अवाप्नोति न सुखम न पराम् गतिम् ।।23।।
अनुवाद~~~~~जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह न सिद्धि को प्राप्त होता है न परम गति को और न सुख को ही।सत साहेब